Friday, November 29, 2013

डिवाइडर



सड़क पर
तेज भागते वाहनों के बीच 
आगे निकलने की होड़ में
गुम हो जाते हैं
सारे कायदे कानून
जहां जगह मिले घुस लो
आगे ,सबसे आगे
निकल लो .

पैदल चलने वाले
बचते जा रहे हैं
बीच सड़क से
हटते जा रहे हैं
किनारे और किनारे,
आओ चलो, पटरी पर  चढ़ें.
सजी धजी दूकानों के बरामदों में
अब यहीं हैं सुरक्षित.
किस किस से बचें,
कहाँ तक लड़ें ?

सड़क के बीचो बीच है
कालीपीली धारियों वाला
डिवाईडर  
अपनी अपनी राह चलो.

सुना है अमरीका में
लोग दाहिने चलते हैं
अपने यहाँ तो
बाएं का ही कायदा है
डिवाइडर से
बड़ा फायदा है.
इधर सुरक्षित ,उधर असुरक्षित
डिवाइडर ने बाँट दी है राह
अपने लिए अपनी राह
बाएं ही सही है
दूसरी राह जो दायें है
गलत है अपने लिए .

सड़क को बाँटते डिवाइडर पर
लगे हैं रंगीन खम्भे
मल्टीनेशनल्स के
रिफलेक्टर ऐड बोर्ड
रात के अँधेरे में
आपकी ही रौशनी
से चमचमाते हैं
बताते हैं
कहाँ है मोड़
कहाँ है रम्बलिंग स्ट्रिप
फ्री रोमिंग ग्लोबल कनेक्टिविटी
अनंत बातें असीम सुविधा
हर पल हर घडी
आपके साथ आपके लिए

बीच राह में है डिवाइडर
रहो अपनी हद में
सीमा में
औकात में
रांग साइड गए
काम से गए
कुचल दिए जाओगे
कानूनन खुद दोषी
वह तो राईट साइड है
ठोंक कर चल देगा .
डिवाइडर से राह में रवानी है
संकरी
मगर रंगीन
हो गयी है सड़क.







इष्टदेव सांकृत्यायन की फेस बुक वाल से




23 अक्टूबर 2013
मेरे पिछले पोस्ट पर भाई Ravi Roy जी का एक कमेंट. संदर्भ के लिए आपको बता दूं, गिरधरगंज गोरखपुर शहर का एक मोहल्ला है. ध्यान रहे, दिल्ली-एनसीआर में अचार की दशा भी ठीकठाक नहीं है. फिलहाल भाई रवि राय जी की बात पर ग़ौर फ़रमाएं :

" इष्टदेव भाई ,एकदम सही घटना बता रहा हूँ ,कल शाम को पत्नी के साथ टाऊनहाल में बुकफेयर देखने गया था . लौटते समय गिरधरगंज के सब्जी मार्केट में रुक गया .आपको पता ही होगा कि आस पास अनेक नई कालोनियां बनजाने से गिरधरगंज अब शहर का एक बहुत बड़ा केंद्र हो चुका है. हमारे बगल में खड़े एक अन्य दम्पति भी पहले से ही सब्जियां ले रहे थे .पत्नी अच्छी अच्छी हरी सब्जियां गोभी,टमाटर ,करेला ,भिन्डी आदि छांट छांट कर रख रही थीं .सारी सब्जी उन्होंने तौलवा कर झोले में रखली .पैसा भी दे दिया. उनके हटने के बाद हमलोग अपने लिए सब्जी लेने लगे .अभी हम वहाँ से हटने ही वाले थे कि वही दम्पति पुनः वापस आ गया. पतिदेव झोले की सारी सब्जी दुकानदार के सामने उलट कर बोले " ये सब अपना सामान वापस ले लो और मेरा पैसा दे दो." दुकानदार से बहस होने लगी ,वह वापस लेने को तैयार नहीं हो रहा था ." अभी आप इतना छांट बीन कर ले गए -कुछ खराब हो तो बताइए ,आखिर मैं क्यों वापस लूं ? " तू तू मैं मैं होने लगी . पति महोदय का कहना था कि इन सब्जियों को बनाने के लिए कम से कम दो तीन किलो प्याज चाहिए. अस्सी रुपये किलो प्याज है . कहाँ से लाऊँ .इतनी महँगी सब्जी खाने से तो अच्छा है कि अचार से ही काम चला लेंगे .पत्नी झिझक की मारी दूर खड़ी थी . उसे इतनी ग्लानि हुई कि वहीँ बुक्का फाड़ कर रोने लगी.पास ख़ड़ी अन्य महिलाएं उसे घेर कर चुप कराने लगीं मगर खुद रुआंसी हो गयीं .करवा चौथ का व्रत भी था .देखते ही देखते वहीँ महामहिला सम्मलेन शुरू हो गया .सारे पति भकुआए खड़े थे .महिलाओं ने निर्णय लिया और ,आप शायद विश्वास नहीं करेंगे,सारी महिलाओं ने अपनी खरीदी सब्जियां दुकानदारों के सामने उलट दिया . नहीं खायेंगे सब्जी , जबतक प्याज का दाम सही नहीं होगा हम लोग अब अचार से ही काम चला लेंगे .प्याज तो किसी भी हालत में लेना ही नहीं है . सारे दूकानदार घबरा गए , पचास रुपये तक भाव तुरंत आ गया .मगर एक बार तय हो गया तो एक भी आदमी प्याज खरीदने नहीं गया .आलू सोलह रुपया है प्याज भी सोलह रुपये किलो दो तभी लेंगे .मैनें अपनी आँखों से देखा .फोन पर बात करते हुए - चालीस रुपये तक का भाव बताते हुए .जो सामने है बेच डालो .अब प्याज का व्यापार करना बंद .जब हालत सही होगी तब फिर देखेंगे . ये हालत है. देश का वाणिज्य मंत्री स्वीकार भी कर रहा है कि मुनाफाखोरों ने प्याज का स्टाक होल्ड कर दिया है . इसके कारण दाम बढे हुए हैं .अबे -तो इसे रोकेगा कौन ? सच कहता हूँ इष्टदेव भाई .देश का यही हाल है ,प्याज महंगा हो गया -प्याज खाना छोड़ दो , बिजली महँगी हो गयी - बिजली कम जलाओ , डकैती बढ़ गयी - संपत्ति मत रक्खो ,बलात्कार बढ़ गया - बहन बेटियों को घर में बंद करके रक्खो ,तालिबान क्या सिर्फ अफगानिस्तान में ही हैं ? अंत में बता दूं.कल रात से मेरे घर में भी सब्जी बंद है .अचार खा खा कर जैसे विचार बन रहे है लिख रहा  हूँ भाई."

नोटा – पब्लिक के हाथ में सोंटा


29 सितंबर 2013 पर 07:50 अपराह्न
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता के हाथ में “नोटा” यानि NONE OF THE ABOVE  का अधिकार थमा कर एक ऐतिहासिक फैसला किया है . RIGHT TO REJECT के नाम से जाने जा रहे इस फैसले के अनुसार अब मतदान की मशीन में सारे प्रत्याशियों के लिए निर्धारित बटनों  के अलावा एक और बटन होगा जिसके दबाने का  सीधा अर्थ होगा कि मतदाता को वर्तमान प्रत्याशियों में से एक भी प्रत्याशी इस लायक नहीं लगा जिसे वह अपना रहनुमा बना सके. यह "राइट टू रिजेक्ट" का विकल्प मतदाता को उस स्थिति में मदद करेगा जब सारे के सारे नालायकों में से कम नालायक को चुनने की मजबूरी आ जाती है. तब मतदाता को या तो झख मारकर किसी नालायक को चुनना ही होता है या फिर वह वोट डालने ही नहीं जाता. यह एक ऐसा तरीका  है जिसे लागू करने पर निर्वाचित प्रत्याशियों की गुणवत्ता बढ़ेगी और मतदान का प्रतिशत भी बढेगा. नोटा के रूप  में सुप्रीमकोर्ट ने सामान्य जनता के हाथ में एक ऐसा सोंटा थमा दिया है जिसे सही ढंग से फटकार कर राजनीतिक जानवरों को काबू किया जा सकता है .कम से कम एक आशा की किरण तो दिखती है .
यहाँ बात को स्पष्ट करने के लिए वर्ष 2009 के आम चुनाव के कुछ चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत कर रहा हूँ .पंद्रहवीं लोकसभा के लिए हुए इस चुनाव में 71.70 करोड़ मतदाताओं में से केवल 41.7 करोड़ लोगों ने मतदान किया अर्थात 58.19 प्रतिशत. इसमें यूपी की स्थिति यह थी कि कुल 11.60 करोड़ मतदाताओं में से मात्र 5.54 करोड़ अर्थात 47.78 प्रतिशत लोगों ने ही वोट डाले.इस चुनाव में हमारे माननीय 543 निर्वाचित सांसदों में सेमात्र 95 ही ऐसे लोकप्रिय निकले जिन्हें कुल मतदान का 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल हुआ जबकि यूपी में मात्र 8 प्रत्याशी ही 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर पाए. यदि हम चुनाव क्षेत्र के समस्त मतदाता संख्या के सापेक्ष देखें तो 380 प्रत्याशियों ऩे अपने चुनाव क्षेत्र के मात्र 30 प्रतिशत वोट हासिल करके भी मैदान मार लिया और आज देश का संविधान नियंत्रित कर रहे हैं. आप को संभवतः यह जान कर आश्चर्य होगा कि य़ू पी की 80 सीटों में से 77 सीटों पर विजयी प्रत्याशियों ऩे अपने क्षेत्र के कुल मतदाताओं में से मात्र 30 प्रतिशत का ही विश्वास हासिल किया .बिहार की तो सभी 40 सीटों पर विजयी प्रत्याशियों का यही हाल रहा जहाँ 2 प्रत्याशी 10 प्रतिशत से भी कम,29 प्रत्याशी 10 से 20 प्रतिशत के बीच और 9 प्रत्याशी 21 से 30 प्रतिशत के बीच वोट पाकर आज संसद भवन में बैठे हैं.
यदि राष्ट्रीय पार्टियों के सन्दर्भ में देखें तो पता चलता है कि विगत लोकसभा के चुनाव में सफल उम्मीदवारों के रूप में कुल मतदान का कांग्रेस के प्रत्याशियों ने 28.55 प्रतिशत ,भाजपा ने 18.80 प्रतिशत ,बसपा ने 6.17 प्रतिशत माकपा ने 5.33 प्रतिशत और भाकपा ने 1.43 प्रतिशत वोट हासिल किये .कुल पंजीकृत मतदाता संख्या के सापेक्ष यह स्थिति इस प्रकार रही -कांग्रेस 16 .61 प्रतिशत, भाजपा 10 .94 प्रतिशत, बसपा 3.59 प्रतिशत,माकपा 3.10 प्रतिशत और भाकपा 0.83 प्रतिशत .
स्पष्ट है कि वतर्मान चुनाव व्यवस्था में  परिवर्तन अब देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए आवश्यक है. ईमानदार और लोकसेवा के प्रति निष्ठावान लोगों को राजनीति में लाना और घोटालेबाजों को बाहर करना " राइट टू रिजेक्ट " से ही संभव लग रहा है."

जन लोकपाल

 ( यह आलेख 31.08.2011 को मैनें लिखा था .मेरे कुछ अग्रजों ने इसे पुनः प्रकाशित करने का निर्देश दिया है. )

जन लोकपाल बिल के लिए चले ऐतिहासिक जनांदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि संभवतः यही है कि आज़ादी के चौंसठ वर्षों बाद  पहली बार जनमानस में वर्तमान चुनावी व्यवस्था को लेकर गंभीर विचार मंथन प्रारंभ हो गया है. संसद में इस बिल के मुद्दों पर मतदान के स्थान पर इसे सर्वसम्मति से पारित कर स्टैंडिंग कमेटी को सौंपने की कार्यवाही के पीछे जो "हिडेन एजेंडा" था ,उससे पूरा देश परिचित है. मतदान कराने पर बिल के खिलाफ जानेवाले सांसद अपने चुनाव क्षेत्र में जनरोष का कैसे सामना करते ? याद करिए जब किरण बेदी ने रामलीला मैदान में अन्ना के मंच से जनता को संसद की कार्यवाही ध्यान से देखने और सुनने के लिए कहा तो उनका आशय भी यही था कि "माननीय" सांसदों की बातों को ध्यान से सुनो और तब उनसे गिन गिन कर हिसाब लो .हिसाब लेने की शुरुआत तो अन्ना के इसी निर्देश से हो गयी थी कि मंत्रियों और सांसदों का घेराव किया जाये.अब बिल को कमेटी के विचारार्थ स्वीकार कर लिया गया है,उसपर आगे क्या होगा,यह भविष्य की बात है, अन्ना आन्दोलन से उपजे कुछ ऐसे बिन्दुओं पर भी चर्चा शुरू हो गयी है जो देश की दशा और दिशा को निश्चित रूप से प्रभावित करेंगे.
सबसे पहली बात तो यह कि हमारा युवा वर्ग जिसे,कुछ समय से यह माना जाने लगा था कि उसे देश और समाज की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं रह गया है,जो अब लगातार सिर्फ भौतिकता की ओर खिंचता चला जा रहा है,जो बिलकुल जिम्मेदार नहीं रह गया है,जो सिर्फ स्वकेंद्रित हो चुका है - उसने न केवल इस आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया बल्कि अहिंसा और अनुशासन का पूरी तरह पालन करते हुए एक मिसाल कायम कर दी .जब दिल्ली आईआईटी के छात्रों ने लाल कृष्ण आडवानी को घेर कर दो टूक सवाल दागने शुरू किये तो उनके पास किसी भी बात का कोई सीधा ज़वाब नहीं था.शुरुआत में अपने दाँव पेंच दिखा रही बीजेपी ने अंततः इसी युवा शक्ति की सक्रियता को भांप कर अन्ना के सामने हथियार डाल दिए. दूसरी बात यह कि देश में भ्रष्टाचार की समस्याओं से जूझती हुई जनता सही और ईमानदार नेतृत्व के अभाव में चुप जरूर थी मगर इस चुप्पी या विवशता को जनता की कमजोरी मानकर लूटखसोट का खुला खेल खेलनेवाले नेताओं के प्रति विद्रोह की आग अन्दर ही अन्दर कहीं धधक रही थीजोसही वक्त पर विकराल ज्वाला केरूपमें भड़क उठी और कपिल सिब्बलों, चिदम्बरों,मनीष तिवारियों,दिग्विजय सिंहों को चूहों की तरह बिलों में घुस कर मुंह छिपाना पड़ा.सीधा अर्थ है किजनता इन नेताओं परसे विश्वास खो चुकी थी.उसे लगने लगाथाकिइनपर भरोसा करके किसी भी प्रकार की मुहिम चलाना सरासर बेमानी होगा ,क्योंकि इनका हर रास्ता सिर्फ और सिर्फ अपने चुनावी फायदे के लिए ही होता है.जब जनता को अन्ना हजारे जैसा खरा-खरा ,तपा तपाया, निर्विवाद व्यक्तित्व वाला नेता मिला तो जनता खुल कर इस आन्दोलन में सामने आ गयी.
अन्ना आन्दोलन ने देश की आम जनता को गंभीरता से विचार करने के लिए एक ऐसा मुद्दा दे दिया है जिस पर चुनावी बाज़ीगरों के हाथों के तोते उड़े हुए हैं और चेहरों पर हवाइयां उड़ रही हैं.यह मुद्दा है हमारी संसद का स्वरुप निर्धारित करने वाली चुनाव व्यवस्था का .अन्ना ने अपना अनशन तोड़ते समय "राइट टू रिजेक्ट" और "राइट टू रिकाल" की बात की .उन्होंने कहा कि मतदाता को वोट देते समय सारे प्रत्याशियों के नाम के साथ ही साथ एक और विकल्प मिलना चाहिए जिससे अगर वह चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में से किसी को भी नहीं वोट देना चाहता तो उसे इस अतिरिक्त विकल्प पर अपना वोट डालने का अधिकार होना चाहिए जिसका सीधा अर्थ होगा कि मतदाता को वर्तमान प्रत्याशियों में से एक भी प्रत्याशी इस लायक नहीं लगा जिसे वह अपना रहनुमा बना सके. यह "राइट टू रिजेक्ट" का विकल्प मतदाता को उस स्थिति में मदद करेगा जब सारे के सारे नालायकों में से कम नालायक को चुनने की मजबूरी आ जाती है. तब या तो उसे झख मारकर किसी नालायक को चुनना होता है या फिर वह वोट डालने ही नहीं जाता. यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे अगर लागू कर दिया जाये तो इससे निर्वाचित प्रत्याशियों की गुणवत्ता बढ़ेगी और मतदान का प्रतिशत भी बढेगा.
यहाँ बात को स्पष्ट करने के लिए वर्ष 2009 के आम चुनाव के कुछ चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत हैं .पंद्रहवीं लोकसभा के लिए हुए इस चुनाव में 71.70 करोड़ मतदाताओं में से केवल 41.7 करोड़ लोगों ने मतदान किया अर्थात 58.19 प्रतिशत.इसमें यूपी की स्थिति यह थी कि कुल 11.60 करोड़ मतदाताओं में से मात्र 5.54 करोड़ अर्थात 47.78 प्रतिशत लोगों ने ही वोट डाले.इस चुनाव में हमारे माननीय 543 निर्वाचित सांसदों में सेमात्र 95 ही ऐसे लोकप्रिय निकले जिन्हें कुल मतदान का 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल हुआ जबकि यूपी में मात्र 8 प्रत्याशी ही 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर पाए. यदि हम चुनाव क्षेत्र के समस्त मतदाता संख्या के सापेक्ष देखें तो 380 प्रत्याशियों ऩे अपने चुनाव क्षेत्र के मात्र 30 प्रतिशत वोट हासिल करके भी मैदान मार लिया और आज विश्व में सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश का संविधान नियंत्रित कर रहे हैं. आप को संभवतः यह जान कर आश्चर्य होगा कि य़ू पी की 80 सीटों में से 77 सीटों पर विजयी प्रत्याशियों ऩे अपने क्षेत्र के कुल मतदाताओं में से मात्र 30 प्रतिशत का ही विश्वास हासिल किया .बिहार की तो सभी 40 सीटों पर विजयी प्रत्याशियों का यही हाल रहा जहाँ 2 प्रत्याशी 10 प्रतिशत से भी कम,29 प्रत्याशी 10 से 20 प्रतिशत के बीच और 9 प्रत्याशी 21 से 30 प्रतिशत के बीच वोट पाकर आज संसद भवन में बैठे हैं.
यदि राष्ट्रीय पार्टियों के सन्दर्भ में देखें तो पता चलता है कि विगत लोकसभा के चुनाव में सफल उम्मीदवारों के रूप में कुल मतदान का कांग्रेस के प्रत्याशियों ने 28.55 प्रतिशत ,भाजपा ने 18.80 प्रतिशत ,बसपा ने 6.17 प्रतिशत माकपा ने 5.33 प्रतिशत और भाकपा ने 1.43 प्रतिशत वोट हासिल किये .कुल मतदाता संख्या के सापेक्ष यह स्थिति इस प्रकार रही -कांग्रेस 16 .61 प्रतिशत, भाजपा 10 .94 प्रतिशत, बसपा 3.59 प्रतिशत,माकपा 3.10 प्रतिशत और भाकपा 0.83 प्रतिशत .
स्पष्ट है कि वतर्मान चुनाव व्यवस्था में आमूल परिवर्तन अब देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए आवश्यक है. ईमानदार और लोकसेवा के प्रति निष्ठावान लोगों को राजनीति में लाना और घोटालेबाजों को बाहर करना अन्ना हजारे के "राइट टू रिजेक्ट -राइट टू रिकाल" से ही संभव लग रहा है."
यहाँ जनकवि देवेन्द्र आर्य की पंक्तियाँ संदर्भित करना चाहूँगा :
"फिर जांचो परखो अपने हथियारों को
फिर से अपना खून-पसीना छानो
वरना क्या होगा तुम जानो.

चुप्पी को हथियार बनाये
ओढ़े धूम-धड़ाका
पारी पारा लुट गए सारे
बाल हुआ न बांका
चूक हुई है हम दोनों से
मानो या न मानो."

कविता और बैंक खाता


किसी ने कहा
कविता लिखना बैंकखाता खोलने से ज्यादा मुश्किल है .
अब है तो है, हो भी सकता है.
बैंक खाते में सिर्फ पैसा है
कविता में धूप है चांदनी है हवा है बारिश है
प्यार है,तकरार है,मिलन की गुजारिश है.
विचार है विमर्श है समस्याएँ हैं संघर्ष है
........ दिल है
निश्चित रूप से नहीं कह सकता - प्रश्न जटिल है
दोनों में कौन सा काम वाकई ज्यादा मुश्किल है .
मेरा किसी बड़े बैंक में खाता नहीं
रहा सवाल कविता का , ये काम मुझे आता नहीं .
कुछ दिनों पहले खाता खुलवाने बैंक चला गया
पहली ही पायदान पर छला गया.
सामने खड़ा होते ही स्वागतबाला ने "हाय डार्लिंग" बोल दिया
मैंने भी झोल दिया - "क्या कहती हैं कोई सुनेगा तो क्या कहेगा,ऐसा कैसेचलेगा ?
वैसे .....चलिए बता दीजिये, कहाँ रहती हैं पता दीजिये."
ओस में भीगे गुलाब की पंखुरियों से लरजते होंठों के घूंघट में से झलकती
अनारदाने जैसी धवल दंतपंक्तियां
कचकचाकर पीसती
कान पर लगा ब्लूटूथ रिसीवर खींचती
चीखी,"शटअप ईडियट. आयम नॉट टाकिंग टू यू"
मोबाईल बंद कर, मुस्करा कर बोली
"यस सर वाट कैन आई डू फार यू."
"खाता खोलना है"
वही मुस्कान
 "उद्दिर को जाने का, लेफ्ट को मारने का - देन
काउंटर नम्बर फोट्टी टू वाली लेन
लेन में लगने का....बरोबर"
कुछ समझ में नहीं आया सब गुड़गोबर.
रिरिआया "जी कृपा करके बता दीजिये
कौन -कौन से प्रमाणपत्र चाहिए समझा दीजिये."
"पट्र....बोले तो ?"
मैं फिर घिघिआया "खाता खोलें तो"
दन्तघर्षणी उत्तर मिला
 "काउंटर नंबर फोट्टी टू ,गो"
मेरे पीछे खड़े न जाने किसे संबोधित करती वही मुस्कान
'यस सर , वाट कैन आई डू फार यू. "


                       (2)


काउंटर नंबर फोट्टी टू
लाइन लगाया नंबर आया,इस बार नहीं घबराया.
मोटे लेंस का चश्मा लगाये पचास साल के रौबदार चेहरे वाले बाबू से सवाल दुहराया
" खाता खोलना है, इतना बता दीजिये, कौन -कौन से प्रमाणपत्र चाहिए, समझा दीजिये."
बाबू ने पूरा-आधे मिनट तक मुझे घूरा "कैसा खाता ?"
"जी वही ...जो बैंक में खुलता है"
"सेविंग कि करेंट"
मैं भकुआ गया
पता नहीं पैसा जमा करने में
कहाँ से करेंट कैसा करेंट
कान्फिडेंस से बोला "जी परमानेंट."
बाबू ने एक फार्म थमा दिया"काउंटर नंबर टू"
फिर वही जापान से टिम्बकटू.
हाथ में फार्म लेकर उल्टा - पलटा,पढ़ा
कुछ पल्ले नहीं पड़ा
हाल में निगाह दौड़ाई - लोग आ रहे थे जा रहे थे पढ़ रहे थे लिख रहे थे,
सभी कुछ न कुछ करते ही दिख रहे थे .
नोट सरिया रहे थे
डीजल पेट्रोल के दाम, गन्ने की पर्ची, खाद के लिये कोहराम,
केंद्र सरकार- ममता का वार, इम्तिहान- पर्चा आउट
संसद में एफ डी आई पर मतदान-वाकआउट
युगल गान - लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए -मैं झंडू बाम हुई , डार्लिंग तेरे लिए
लोग गरिया रहे थे.
प्रेमी युगल की हत्या,आनर किलिंग, मूंछ की समस्या
लोग बतिया रहे थे
लोग अभ्यस्त थे,हर काउंटर व्यस्त थे
सचिन की सौवीं सेंचुरी, अडवानी की यात्रा,स के उप्पर ओ ,न पर छोटी इ ,य पर आ की मात्रा .
अन्ना हजारे ,केजरीवाल,ब्याज की दरों में वृद्धि,शेयरों में गिरावट,मार्केट का हाल.
वोटर कार्ड,क्रेडिट कार्ड,आधार कार्ड,स्मार्ट कार्ड,वाल मार्ट
लोग बतिया रहे थे
दिल्ली की बस में बेबस लड़की से बलात्कार ,
वी वांट जस्टिस -रायसीना पर आतंकित बच्चों का चीत्कार
पानी की बौछार ,लाठी का वार ,लोकतंत्र का सरकारी बलात्कार
जनगण को मनभर अधिनायक लतिया रहे थे
बातें हैं कि ख़तम ही नहीं होतीं,काम है कि शुरू ही नहीं होता
गुब्बारे में हवा भरती जा रही है,देश की अर्थव्यवस्था फलफूल रही है,
जनता बकलोल है, झूलाझूल रही है
रघुपति राघव राजा राम- राजघाट पर मुक्तिधाम,
दिमागी बुखार से बच्चे मच्छरों की तरह मर रहे हैं
"परिंदा भी पर नहीं मार सकता -हम इंतज़ाम कर रहेहैं "
सूबे को एक सौ साठ अरब की सौगात,राजा की आयेगी बारात
हथिया नक्षत्र -भारी बरखा ,पहले हम -फिर तू खा
पंचकोटि महामनी- कौन बनेगा करोडपति.सौ करोड़ का रावण
मन रे -तू काहे न धीर धरे ,कोई गीत सुना -कुछ गुनगुना
मन रे ..... गा
नाच मेरी बुलबुल पैसा मिलेगा,कहाँ कदरदान तुझे ऐसा मिलेगा
साल में सौ दिन काम मिलेगा,काम का पूरा दाम मिलेगा.
परधान जी,कइसे काम होगा ?
अबे गदहे की दुम- आधा हम आधा तुम,कागज पर दस्तखत- कागज पर काम
पता न पाए सीताराम. बोलो पट्टू, राम राम.


                  (3)


 " हैल्लो ... अंकल तबियत तो ठीक है ?"
मोबाईल ,हेडफोन लैपटॉपधारी युवक सामने खड़ा था
मेरे हाथ में फार्म अभी यूँ ही पड़ा था
"खाता खोलने का है?"
मेरी अचकचाई मुंडी हिलते ही ,समझ गया -मेरी हाँ है
कलम निकाला ,नाम पता पूछ कर फटाफट फार्म भरडाला
मैं कृतकृत्य हो गया ,ये है होनहार पीढ़ी -समाज और देश के प्रति संवेदनशील
बड़ों की इज्ज़त ज़रुरतमंद की मदद ,वह वा ...... वह वा ,क्या संस्कार है
देखिये ,पढ़ने लिखने से बहुत अंतर पड़ता है सेवाभावना जागृत होती है
आज इसी की दरकार है .
फार्म भर गया- मैं भी जैसे पुनः सम्हर गया
युवक ने मेरा हस्ताक्षर लिया ,लैपटॉप खोला , वेबकैम क्लिक किया
फोटो खींची,दो मिनट में सब दुरुस्त
"अंकलजी , डाकूमेंट "
मैंने मुंह बा दिया "अरे बेटा - - -अभी तो सिर्फ पता करने आया था"
"कोई बात नहीं अंकल- पासपोर्ट ,पैन कार्ड, सैलेरी स्लिप, ड्राइविंग लाइसेंस, गुड हेल्थ सर्टिफिकेट
लेकर आ जाना,फटाफट फ़ाइनल हो जायेगा झटाझट चले जाना
अब्बी आओ बाहर को छोड़ दूं"
मेरे हाथ पकड़े, भीड़ में रास्ता बनाता, सबको हटाता बाहर आया
"अंकल, सारे कागज़ ले आना
खाता खुल जायेगा,रिस्पेक्ट्फुल्ली अपना पासबुक ले जाना
कहाँ आप जैसा, सीनियर सिटिजन ,रेस्पेक्टेड पर्सन, खाता खुलवाने
भीड़ में धक्के खाता फिरेगा, अपुन इधरिच मिलेंगा"
मेरी तो ऑंखें छलकने को हो आयीं
किसी संस्कारित घर का चश्मेचिराग है
"बहुत बहुत धन्यवाद बेटा जुग जुग जियो
कागज़ जुटाने में टाइम तो लगेगा
लेकिन मेरा खाता अब लगता है जरूर खुलेगा
अच्छा तो हम चलते हैं , राम राम "


             (4)


ज्योंही मुड़ा,कंधे पर युवक का हाथ पड़ा
"अंकल, हंड्रेड रुप्पीज ,प्लीज़"
मैं अचकचाया "बेटा खाता खुलेगा तब न "
"माई डियर अंकल, अपुन का सर्विस चार्ज "
"कैसा सर्विस चार्ज?"
"ओये बुड्ढे - काए कू खाली पीली बोम मारता
सुबू सुबू भेजा नई ख़राब करने का......क्या ?
घंटे भर से तेरे पिच्छू पिच्छू घंटा हिला रिया
फारम फोटू सब कर रिया
अब मजूरी देने में पिछाड़ी दिखा रिया
बोले तो ...फटने लगी”
अचानक जाने कहाँ से भीड़ जुटने लगी
मुझे थरथरी छूटने लगी
चश्मेचिराग ने कन्धा छोड़ कालर पकड़ लिया
डर के मारे कांपने लगा,जैसे सन्निपात ने जकड़ लिया
लोग क्या है क्या है करते हुए जुटने लगे
"अरे कोई नई, यार,ये हलकट बुड्ढा,घंटे भर से,तंग कर रिया है
काम करा लिया मजूरी से मुकर रिया है"
"पर मेरा खाता तो अभी खुला नहीं "
"ओये अंकल की दुम ,अक्कल से पैदल क्या तुम,कागज लाने का तब्बी तो खाता खुलवाने का
मेरे कू कागज दे अब्बी के अब्बी,चोपड़ी ला के तेरे मूँ पे मारा नईं
अपुन का नाम सिकंदर दारा नईं"
जनमत का सम्मान किया- गाँधी छाप का दान किया
"थैंक यू वेरी मच अंकल " युवक ने बाकायदे हाथ मिलाया
हैण्ड पाइप के हैंडिल की तरह हाथ पकड़ कर,ऊपर नीचे कई बारहिलाया
"वैसे मोस्ट रेस्पेक्टेड सर, खाता खोलने कू मालकित्ता लाये थे ?"
"दारा सिंग जी हम तो यही सौ रूपया काट कूट कर जुटा पाए थे"
"तो भूतनी के- सुन,जल्दी फूट,उदिर कू,पतली गली है
अबे हियाँ तेरे जैसे,झंडू का काम नईं,
दस हजार से,खाता खुलता है
मल्टीनेशनलबैंक है,बड़ा बैंक है,
हेड आफिस,इटली है
ओक्के - - -हैव अ वेरी नाईस डे सर, बाई बाई"
मैं कुछ भी  नहीं बोल पाया ,
किसी बड़े बैंक में खाता
अभी तक  नहीं खोल पाया .

खिचड़ी का स्वाद


15 जनवरी 2012 पर 02:02 अपराह्न
इस वर्ष 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जा रही है जबकि पहले यह हमेशा 14 जनवरी को ही मनाई जाती थी .इस विषय पर टी वी और अखबार से ले कर सोशल साइट्स पर भी तमाम चर्चाएँ हो रही हैं .हमारे गोरखपुर में सिद्ध योगी गुरु गोरखनाथ का मंदिर है .मकर संक्रांति के दिन लाखों की संख्या में लोग इस मंदिर में आते हैं और मंदिर के मुख्य गह्वर में चावल ,उरद की दाल ,हल्दी ,नमक ,सिक्के आदि बाबा गोरखनाथ की मूर्ति के सामने भेंट करते हैं .इसे खिचड़ी चढ़ाना भी कहा जाता है.सीमावर्ती देश नेपाल से लेकर उत्तर पश्चिम बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह एक प्रमुख पर्व है .आज के दिन लोग खिचड़ी बनाकर खाते भी हैं .आज की खिचड़ी साधारण नहीं बल्कि विशेष तौर तरीकों से बनती है .सब्जियों का मौसम आ गया है तो आलू प्याज गोभी मटर टमाटर बैंगन सेम गाज़र पत्तागोभी पालक मेथी का साग धनिया सोया अदरक सब कुछ इस खिचड़ी में पड़ता है .ढेर सारी प्याज से देशी घी में छौंक लगा कर और थाली में परसने के बाद ऊपर से कड़कता हुआ ढेर सारा देशी घी डाल कर मूली प्याज चुकंदर टमाटर का मिक्स्ड सलाद , आम या लाल मिर्च का अचार,हरी मिर्च और नींबू के साथ ,तला हुआ पापड सजाव दही जिसमें चीनी नहीं गुड का चूरा पड़ा हो- खिली धूप में परिवार संग खाने का ....चम्मच से नहीं......हाथ से ....उंगलियाँ चाट चाट कर खाने का ....लुत्फ़ शायद आप सारी उम्र नहीं भूल पाएंगे....जैसे कि मैं खुद नहीं भूला हूँ .
माँ और चाची मेरे पुराने घर में आज के दिन सुबह से लकड़ी के चूल्हे पर बड़ा सा हंडा चढ़ा देती थीं ,हम आठ भाई-बहन नहा धो कर खिचड़ी का स्पर्श करके (जिसे खिचड़ी छूना कहते हैं) फटाफट तैयार हो जाते थे . गुड में पगे हुए काले और सफ़ेद तिल ,लईया,चिवडा के सोंधी सोंधी महक वाले लड्डुओं के लिए पहले तो शराफत से ,फिर चोरी और शरारत से और बाद में छीना-झपटी से भी घर में तूफ़ान उठ जाता .बड़े मना करते -ज्यादा मत खा पेट खराब हो जायेगा - मगर भला कौन मानता है.इधर खिचड़ी के हंडे पर कलछुल की चोट बच्चों को अलग पुकार लगाती रहती.
मुझे याद है कि एक बार मेरे चाचा स्वर्गीय श्री ध्यान प्रकाश राय (महात्मा डी पी राय ,भू पू राष्ट्रीय अध्यक्ष,डिप्लोमा इन्जिनिएर्स  फेडेरशन  ) ने -जो मेरे चाचा कम दोस्त अधिक थे -जबतक खिचड़ी तैयार हुई सारे बच्चों की रेल गाड़ी बना कर खुद इंजन बन गए और पूरे अहाते में बाकायदे नारा लगाते रेल गाड़ी दौड़ती रही -"भूख लगी है खिचड़ी दो -बोलो बाबा गोरखनाथ की जय " माँ और चाची हंसती, झुंझलाती परेशान हो गयीं.जब खाने का बुलावा आया तो बजाय अलग अलग थाली या प्लेट के चाचा जी ने एक बड़ी सी परात में भरपूर परसवाया.दही अचार पापड़ सलाद के साथ ढल ढल बहते गरमागरम देशी घी में छाने हुए लाल लाल कुरमुरे प्याज के टुकड़ों से सजी धजी खिचड़ी का   वह  स्वाद ताजिंदगी मैं भुला नहीं सकता .घंटे भर चली रेलगाड़ी की दौड़ से पस्त बच्चों ने जमकर खाया मन भर कर मज़ा लिया .एक साथ सारे भाई बहनों का वह समूह भोज आज भी स्मृतियों के किसी न किसी कोने में ताज़ा है ऐसे जैसे कि अभी कल की ही बात हो .आप भी याद करें तो अवश्य इन पर्वों पर पुरानी स्मृतियाँ अवश्य कहीं न कहीं मन के तार झनझनाती निकल कर आयेंगी .इन्हें संजो कर रक्खें ,इनके अहसास को महसूस करें और संभव हो तो इन्हें बाँटें भी .आप सभी....आपके परिवार को ...खास तौर पर बच्चों को मकर संक्रांति की ढेर सारी शुभकामनाएं.एक गुजारिश है .आज के दिन दान का वास्तविक पुन्य कमाना हो तो किसी गरीब को , ठंढ से ठिठुरते को ,किसी भूखे बच्चे को दान दें .मंदिरों में दान करने वाले तो लाखों हैं ही

वन पीस लिविंग लीजेंड


25 दिसंबर 2011 पर 09:42 पूर्वाह्न
  ईश्वर ने जब उन्हें बनाया तो उसके बाद उसका सांचा ही टूट गया .धरती पर इकलौते वन पीस में लिविंग लीजेंड हैं .उनकी कुछ विशेषताएं -  
1-यदि आपने उनके सामने न्यूटन का नाम ले लिया तो वे शुरू हो जायेंगे -जउने बगइचा में न्यूटनवा के मूड़ी पर सेब गिरा ऊ हमरे परदादा के परदादा के परदादा का था .ऊ तो अपने पेड़ पर चढ़ कर सेब तूड़ रहे थे.नीचे कानि कहाँ से ओहीं न्यूटनवा आके बईठ गया .हमरे परदादा के परदादा के परदादा ने हींच के मारा एक सेब -स्साले ई तुहरे बाप का बगइचा है ,हियाँ से भागो -अब न्यूटनवा तो ठहरा भईया सैंटिस्ट,पैलवान तो ऊ रहबे किया. धइके पेड़वे झकझोर दिया . हमरे परदादा के परदादा के परदादा लद्द से भुइयां पर टपक पड़े .कन्हियांव चिटिक गया .लगे गरियाने -तेरी मां की ,तेरी भैन की . न्यूटनवा लगा घिघियाने -बाऊजी, हम इ नहीं न जानते थे कि आप गिर जायेंगे.हम्में माफ़ी दे दीजिये हजूर ..गलती हो गयी .हमरे परदादा के परदादा के परदादा बोले अबे चूतिये ,गुरुत्वाकर्षण का नियम्वे नहीं जानता है का बे. पेड़वा हिलेगा तो हवा से हमारी धोती नहीं खुल जायेगी ..अब धोती सम्हारने के चक्कर में हाथ छूटेगा तो हम गिर नहीं जायेंगे त का लटके रहेंगे बे बकलोल ...अब तो का कहें भईया. न्यूटनवा लगा हमरे परदादा के परदादा के परदादा का गोड़ धरने .ए बाऊजी ,तनी हमहूँ के बता दीं न गुरुत्वाकर्षण के नियम .एतना गोड़धरिया किया कि हमरे परदादा के परदादा के परदादा का करेजा हिल गया .उहे बता दिए न्यूटनवा को सब नियम .बाद में जब तक .हमरे परदादा के परदादा के परदादा जीते रहे न्यूटनवा सुबह साम उनका गोड़ छूने आता रहा .हमरे परदादा के परदादा के परदादा जेतना नियम जानते रहे सब न्यूटनवा को सिखा बता दिए .त आज से जान लो इ सब हमरे परदादा के परदादा के परदादा का कमाल था .इ न्यूटन फ्युटन कुछ था थोड़ेन.                                                                    
2-एक दिन किसी ने उनके सामने शेक्सपियर का नाम ले लिया.शुरू हो गए -तूं लोग का जानो.इ सेक्सपियर का जेतना साहित्य है सब कुइन विक्टोरिया का लिखा है .अरे भईया जी का कहते हैं क्वीन विक्टोरिया तो अंगरेजों की महारानी का नाम था ....तुहूँ लोग बुरबके हो .अरे विक्टोरिया एक ठो आदमी था .राजमहल में धोती पहिन के रहता था .हरदम लिखता पढता रहता था .जात का लाला था .लाला मने कायथ .उसका असली नाम था बाबू कटोरी लाल जो कि अंगरेजवों ने बिगाड़ कर बी कटोरी और बाद में विक्टोरिया कर डाला .जानते हो ऊ कऊन था.अरे उहे थे न हमरे परदादा के परदादा के परदादा .                                                                                                       
3 -किसी के घर गए तो चाय के साथ समोसा खाने को दिया गया .जबतक सब एक समोसा उठाते उन्होंने तीन चार गपक लिए.फिर बोले -ये समोसा साली असल में है बड़ी ख़राब चीज़ .अन्दर आलू भर कर ऊपर से मैदा लपेट देंगे ,छान कर रख देंगे --लो खाओ.
 4 -किसी ने अपनी लडकी की शादी में न्यौता दे दिया.पहुँच कर खाया पिया और चलते चलते बोले -चलो भाई एक जिम्मेदारी से मुक्त हो गए .जवान लड़की जितनी जल्दी अपने ससुराल चली जाये उतना ही बढ़िया .जुग जमाना देख ही रहे हैं .इस लड़की के लच्छन भी बिगड़ रहे थे. आवारा लौंडों के साथ घूमती थी ,शादी कर दिया .अब जाये अपने ससुराल जउन मन करे तउन करे.फुर्सत हुई.जय राम जी की. 
 5 -शर्मा जी की पत्नी का देहांत हुआ तो पहुँच गए शोक संवेदना व्यक्त करने .अरे का हो सरमा जी .इ तो बड़ा बुरा हुआ यार .पचास गो बीमारी तोंहके और भगवान जी उठा ले गए तोहरे मेहरारू को.इ भगवानो जी न. बहुत ख़राब आदमी हैं -इहो नहीं देखते कि सरमा जी को ले गए होते तो निठल्ला लड़का घरे बईठा है एउजी में ऊ नौकरिये पा जाता .एलाइसी,पीयफ,ग्रेचुटी,फ्रेचुटी जोड़जाड़ के पंद्रह बीस लाख रूपया भी मिल जाता.मेहरारू से ले के लईके-फइके सब टनाटन रहते.मेहरारू के मुअले का मिलेगा – घंटा ?  
 6 -यदि कभी ट्राफिक सिग्नल पर देर तक रुकना पड़े और अचानक आवाज सुनाई दे 'अबे सिपहिया ,एन्ने हथवा कहें नाहीं देता बे '...बस समझ लीजिये की आप उसी महान हस्ती की आवाज सुन रहे हैं.  
 7 - यदि कभी चौराहे पर ट्राफिक का सिपाही किसी को पीट रहा हो और वो आदमी बार बार एक ही वाक्य बोल रहा हो 'मैं तेरी फित्ती उतरवा लूँगा ' ...तो बस समझ लीजिये कि आप उसी महान हस्ती के साक्षात् दर्शन कर रहे हैं .             
               ऐसे दुर्लभ वन पीस हस्ती के दर्शन पूर्व जन्म के कर्मों वाले को ही मिलते हैं .अतः कभी आपको ऐसा अवसर मिल जाये तो यह निश्चित जानिए कि यह आपके पूर्व जन्म के कुकर्मों का परिणाम है .