( यह आलेख 31.08.2011 को मैनें लिखा था .मेरे कुछ अग्रजों ने इसे पुनः प्रकाशित करने का निर्देश दिया है. )
जन लोकपाल बिल के लिए चले ऐतिहासिक जनांदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि संभवतः यही है कि आज़ादी के चौंसठ वर्षों बाद पहली बार जनमानस में वर्तमान चुनावी व्यवस्था को लेकर गंभीर विचार मंथन प्रारंभ हो गया है. संसद में इस बिल के मुद्दों पर मतदान के स्थान पर इसे सर्वसम्मति से पारित कर स्टैंडिंग कमेटी को सौंपने की कार्यवाही के पीछे जो "हिडेन एजेंडा" था ,उससे पूरा देश परिचित है. मतदान कराने पर बिल के खिलाफ जानेवाले सांसद अपने चुनाव क्षेत्र में जनरोष का कैसे सामना करते ? याद करिए जब किरण बेदी ने रामलीला मैदान में अन्ना के मंच से जनता को संसद की कार्यवाही ध्यान से देखने और सुनने के लिए कहा तो उनका आशय भी यही था कि "माननीय" सांसदों की बातों को ध्यान से सुनो और तब उनसे गिन गिन कर हिसाब लो .हिसाब लेने की शुरुआत तो अन्ना के इसी निर्देश से हो गयी थी कि मंत्रियों और सांसदों का घेराव किया जाये.अब बिल को कमेटी के विचारार्थ स्वीकार कर लिया गया है,उसपर आगे क्या होगा,यह भविष्य की बात है, अन्ना आन्दोलन से उपजे कुछ ऐसे बिन्दुओं पर भी चर्चा शुरू हो गयी है जो देश की दशा और दिशा को निश्चित रूप से प्रभावित करेंगे.
सबसे पहली बात तो यह कि हमारा युवा वर्ग जिसे,कुछ समय से यह माना जाने लगा था कि उसे देश और समाज की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं रह गया है,जो अब लगातार सिर्फ भौतिकता की ओर खिंचता चला जा रहा है,जो बिलकुल जिम्मेदार नहीं रह गया है,जो सिर्फ स्वकेंद्रित हो चुका है - उसने न केवल इस आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया बल्कि अहिंसा और अनुशासन का पूरी तरह पालन करते हुए एक मिसाल कायम कर दी .जब दिल्ली आईआईटी के छात्रों ने लाल कृष्ण आडवानी को घेर कर दो टूक सवाल दागने शुरू किये तो उनके पास किसी भी बात का कोई सीधा ज़वाब नहीं था.शुरुआत में अपने दाँव पेंच दिखा रही बीजेपी ने अंततः इसी युवा शक्ति की सक्रियता को भांप कर अन्ना के सामने हथियार डाल दिए. दूसरी बात यह कि देश में भ्रष्टाचार की समस्याओं से जूझती हुई जनता सही और ईमानदार नेतृत्व के अभाव में चुप जरूर थी मगर इस चुप्पी या विवशता को जनता की कमजोरी मानकर लूटखसोट का खुला खेल खेलनेवाले नेताओं के प्रति विद्रोह की आग अन्दर ही अन्दर कहीं धधक रही थीजोसही वक्त पर विकराल ज्वाला केरूपमें भड़क उठी और कपिल सिब्बलों, चिदम्बरों,मनीष तिवारियों,दिग्विजय सिंहों को चूहों की तरह बिलों में घुस कर मुंह छिपाना पड़ा.सीधा अर्थ है किजनता इन नेताओं परसे विश्वास खो चुकी थी.उसे लगने लगाथाकिइनपर भरोसा करके किसी भी प्रकार की मुहिम चलाना सरासर बेमानी होगा ,क्योंकि इनका हर रास्ता सिर्फ और सिर्फ अपने चुनावी फायदे के लिए ही होता है.जब जनता को अन्ना हजारे जैसा खरा-खरा ,तपा तपाया, निर्विवाद व्यक्तित्व वाला नेता मिला तो जनता खुल कर इस आन्दोलन में सामने आ गयी.
अन्ना आन्दोलन ने देश की आम जनता को गंभीरता से विचार करने के लिए एक ऐसा मुद्दा दे दिया है जिस पर चुनावी बाज़ीगरों के हाथों के तोते उड़े हुए हैं और चेहरों पर हवाइयां उड़ रही हैं.यह मुद्दा है हमारी संसद का स्वरुप निर्धारित करने वाली चुनाव व्यवस्था का .अन्ना ने अपना अनशन तोड़ते समय "राइट टू रिजेक्ट" और "राइट टू रिकाल" की बात की .उन्होंने कहा कि मतदाता को वोट देते समय सारे प्रत्याशियों के नाम के साथ ही साथ एक और विकल्प मिलना चाहिए जिससे अगर वह चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में से किसी को भी नहीं वोट देना चाहता तो उसे इस अतिरिक्त विकल्प पर अपना वोट डालने का अधिकार होना चाहिए जिसका सीधा अर्थ होगा कि मतदाता को वर्तमान प्रत्याशियों में से एक भी प्रत्याशी इस लायक नहीं लगा जिसे वह अपना रहनुमा बना सके. यह "राइट टू रिजेक्ट" का विकल्प मतदाता को उस स्थिति में मदद करेगा जब सारे के सारे नालायकों में से कम नालायक को चुनने की मजबूरी आ जाती है. तब या तो उसे झख मारकर किसी नालायक को चुनना होता है या फिर वह वोट डालने ही नहीं जाता. यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे अगर लागू कर दिया जाये तो इससे निर्वाचित प्रत्याशियों की गुणवत्ता बढ़ेगी और मतदान का प्रतिशत भी बढेगा.
यहाँ बात को स्पष्ट करने के लिए वर्ष 2009 के आम चुनाव के कुछ चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत हैं .पंद्रहवीं लोकसभा के लिए हुए इस चुनाव में 71.70 करोड़ मतदाताओं में से केवल 41.7 करोड़ लोगों ने मतदान किया अर्थात 58.19 प्रतिशत.इसमें यूपी की स्थिति यह थी कि कुल 11.60 करोड़ मतदाताओं में से मात्र 5.54 करोड़ अर्थात 47.78 प्रतिशत लोगों ने ही वोट डाले.इस चुनाव में हमारे माननीय 543 निर्वाचित सांसदों में सेमात्र 95 ही ऐसे लोकप्रिय निकले जिन्हें कुल मतदान का 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल हुआ जबकि यूपी में मात्र 8 प्रत्याशी ही 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर पाए. यदि हम चुनाव क्षेत्र के समस्त मतदाता संख्या के सापेक्ष देखें तो 380 प्रत्याशियों ऩे अपने चुनाव क्षेत्र के मात्र 30 प्रतिशत वोट हासिल करके भी मैदान मार लिया और आज विश्व में सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश का संविधान नियंत्रित कर रहे हैं. आप को संभवतः यह जान कर आश्चर्य होगा कि य़ू पी की 80 सीटों में से 77 सीटों पर विजयी प्रत्याशियों ऩे अपने क्षेत्र के कुल मतदाताओं में से मात्र 30 प्रतिशत का ही विश्वास हासिल किया .बिहार की तो सभी 40 सीटों पर विजयी प्रत्याशियों का यही हाल रहा जहाँ 2 प्रत्याशी 10 प्रतिशत से भी कम,29 प्रत्याशी 10 से 20 प्रतिशत के बीच और 9 प्रत्याशी 21 से 30 प्रतिशत के बीच वोट पाकर आज संसद भवन में बैठे हैं.
यदि राष्ट्रीय पार्टियों के सन्दर्भ में देखें तो पता चलता है कि विगत लोकसभा के चुनाव में सफल उम्मीदवारों के रूप में कुल मतदान का कांग्रेस के प्रत्याशियों ने 28.55 प्रतिशत ,भाजपा ने 18.80 प्रतिशत ,बसपा ने 6.17 प्रतिशत माकपा ने 5.33 प्रतिशत और भाकपा ने 1.43 प्रतिशत वोट हासिल किये .कुल मतदाता संख्या के सापेक्ष यह स्थिति इस प्रकार रही -कांग्रेस 16 .61 प्रतिशत, भाजपा 10 .94 प्रतिशत, बसपा 3.59 प्रतिशत,माकपा 3.10 प्रतिशत और भाकपा 0.83 प्रतिशत .
स्पष्ट है कि वतर्मान चुनाव व्यवस्था में आमूल परिवर्तन अब देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए आवश्यक है. ईमानदार और लोकसेवा के प्रति निष्ठावान लोगों को राजनीति में लाना और घोटालेबाजों को बाहर करना अन्ना हजारे के "राइट टू रिजेक्ट -राइट टू रिकाल" से ही संभव लग रहा है."
यहाँ जनकवि देवेन्द्र आर्य की पंक्तियाँ संदर्भित करना चाहूँगा :
"फिर जांचो परखो अपने हथियारों को
फिर से अपना खून-पसीना छानो
वरना क्या होगा तुम जानो.
चुप्पी को हथियार बनाये
ओढ़े धूम-धड़ाका
पारी पारा लुट गए सारे
बाल हुआ न बांका
चूक हुई है हम दोनों से
मानो या न मानो."
जन लोकपाल बिल के लिए चले ऐतिहासिक जनांदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि संभवतः यही है कि आज़ादी के चौंसठ वर्षों बाद पहली बार जनमानस में वर्तमान चुनावी व्यवस्था को लेकर गंभीर विचार मंथन प्रारंभ हो गया है. संसद में इस बिल के मुद्दों पर मतदान के स्थान पर इसे सर्वसम्मति से पारित कर स्टैंडिंग कमेटी को सौंपने की कार्यवाही के पीछे जो "हिडेन एजेंडा" था ,उससे पूरा देश परिचित है. मतदान कराने पर बिल के खिलाफ जानेवाले सांसद अपने चुनाव क्षेत्र में जनरोष का कैसे सामना करते ? याद करिए जब किरण बेदी ने रामलीला मैदान में अन्ना के मंच से जनता को संसद की कार्यवाही ध्यान से देखने और सुनने के लिए कहा तो उनका आशय भी यही था कि "माननीय" सांसदों की बातों को ध्यान से सुनो और तब उनसे गिन गिन कर हिसाब लो .हिसाब लेने की शुरुआत तो अन्ना के इसी निर्देश से हो गयी थी कि मंत्रियों और सांसदों का घेराव किया जाये.अब बिल को कमेटी के विचारार्थ स्वीकार कर लिया गया है,उसपर आगे क्या होगा,यह भविष्य की बात है, अन्ना आन्दोलन से उपजे कुछ ऐसे बिन्दुओं पर भी चर्चा शुरू हो गयी है जो देश की दशा और दिशा को निश्चित रूप से प्रभावित करेंगे.
सबसे पहली बात तो यह कि हमारा युवा वर्ग जिसे,कुछ समय से यह माना जाने लगा था कि उसे देश और समाज की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं रह गया है,जो अब लगातार सिर्फ भौतिकता की ओर खिंचता चला जा रहा है,जो बिलकुल जिम्मेदार नहीं रह गया है,जो सिर्फ स्वकेंद्रित हो चुका है - उसने न केवल इस आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया बल्कि अहिंसा और अनुशासन का पूरी तरह पालन करते हुए एक मिसाल कायम कर दी .जब दिल्ली आईआईटी के छात्रों ने लाल कृष्ण आडवानी को घेर कर दो टूक सवाल दागने शुरू किये तो उनके पास किसी भी बात का कोई सीधा ज़वाब नहीं था.शुरुआत में अपने दाँव पेंच दिखा रही बीजेपी ने अंततः इसी युवा शक्ति की सक्रियता को भांप कर अन्ना के सामने हथियार डाल दिए. दूसरी बात यह कि देश में भ्रष्टाचार की समस्याओं से जूझती हुई जनता सही और ईमानदार नेतृत्व के अभाव में चुप जरूर थी मगर इस चुप्पी या विवशता को जनता की कमजोरी मानकर लूटखसोट का खुला खेल खेलनेवाले नेताओं के प्रति विद्रोह की आग अन्दर ही अन्दर कहीं धधक रही थीजोसही वक्त पर विकराल ज्वाला केरूपमें भड़क उठी और कपिल सिब्बलों, चिदम्बरों,मनीष तिवारियों,दिग्विजय सिंहों को चूहों की तरह बिलों में घुस कर मुंह छिपाना पड़ा.सीधा अर्थ है किजनता इन नेताओं परसे विश्वास खो चुकी थी.उसे लगने लगाथाकिइनपर भरोसा करके किसी भी प्रकार की मुहिम चलाना सरासर बेमानी होगा ,क्योंकि इनका हर रास्ता सिर्फ और सिर्फ अपने चुनावी फायदे के लिए ही होता है.जब जनता को अन्ना हजारे जैसा खरा-खरा ,तपा तपाया, निर्विवाद व्यक्तित्व वाला नेता मिला तो जनता खुल कर इस आन्दोलन में सामने आ गयी.
अन्ना आन्दोलन ने देश की आम जनता को गंभीरता से विचार करने के लिए एक ऐसा मुद्दा दे दिया है जिस पर चुनावी बाज़ीगरों के हाथों के तोते उड़े हुए हैं और चेहरों पर हवाइयां उड़ रही हैं.यह मुद्दा है हमारी संसद का स्वरुप निर्धारित करने वाली चुनाव व्यवस्था का .अन्ना ने अपना अनशन तोड़ते समय "राइट टू रिजेक्ट" और "राइट टू रिकाल" की बात की .उन्होंने कहा कि मतदाता को वोट देते समय सारे प्रत्याशियों के नाम के साथ ही साथ एक और विकल्प मिलना चाहिए जिससे अगर वह चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में से किसी को भी नहीं वोट देना चाहता तो उसे इस अतिरिक्त विकल्प पर अपना वोट डालने का अधिकार होना चाहिए जिसका सीधा अर्थ होगा कि मतदाता को वर्तमान प्रत्याशियों में से एक भी प्रत्याशी इस लायक नहीं लगा जिसे वह अपना रहनुमा बना सके. यह "राइट टू रिजेक्ट" का विकल्प मतदाता को उस स्थिति में मदद करेगा जब सारे के सारे नालायकों में से कम नालायक को चुनने की मजबूरी आ जाती है. तब या तो उसे झख मारकर किसी नालायक को चुनना होता है या फिर वह वोट डालने ही नहीं जाता. यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे अगर लागू कर दिया जाये तो इससे निर्वाचित प्रत्याशियों की गुणवत्ता बढ़ेगी और मतदान का प्रतिशत भी बढेगा.
यहाँ बात को स्पष्ट करने के लिए वर्ष 2009 के आम चुनाव के कुछ चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत हैं .पंद्रहवीं लोकसभा के लिए हुए इस चुनाव में 71.70 करोड़ मतदाताओं में से केवल 41.7 करोड़ लोगों ने मतदान किया अर्थात 58.19 प्रतिशत.इसमें यूपी की स्थिति यह थी कि कुल 11.60 करोड़ मतदाताओं में से मात्र 5.54 करोड़ अर्थात 47.78 प्रतिशत लोगों ने ही वोट डाले.इस चुनाव में हमारे माननीय 543 निर्वाचित सांसदों में सेमात्र 95 ही ऐसे लोकप्रिय निकले जिन्हें कुल मतदान का 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल हुआ जबकि यूपी में मात्र 8 प्रत्याशी ही 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर पाए. यदि हम चुनाव क्षेत्र के समस्त मतदाता संख्या के सापेक्ष देखें तो 380 प्रत्याशियों ऩे अपने चुनाव क्षेत्र के मात्र 30 प्रतिशत वोट हासिल करके भी मैदान मार लिया और आज विश्व में सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश का संविधान नियंत्रित कर रहे हैं. आप को संभवतः यह जान कर आश्चर्य होगा कि य़ू पी की 80 सीटों में से 77 सीटों पर विजयी प्रत्याशियों ऩे अपने क्षेत्र के कुल मतदाताओं में से मात्र 30 प्रतिशत का ही विश्वास हासिल किया .बिहार की तो सभी 40 सीटों पर विजयी प्रत्याशियों का यही हाल रहा जहाँ 2 प्रत्याशी 10 प्रतिशत से भी कम,29 प्रत्याशी 10 से 20 प्रतिशत के बीच और 9 प्रत्याशी 21 से 30 प्रतिशत के बीच वोट पाकर आज संसद भवन में बैठे हैं.
यदि राष्ट्रीय पार्टियों के सन्दर्भ में देखें तो पता चलता है कि विगत लोकसभा के चुनाव में सफल उम्मीदवारों के रूप में कुल मतदान का कांग्रेस के प्रत्याशियों ने 28.55 प्रतिशत ,भाजपा ने 18.80 प्रतिशत ,बसपा ने 6.17 प्रतिशत माकपा ने 5.33 प्रतिशत और भाकपा ने 1.43 प्रतिशत वोट हासिल किये .कुल मतदाता संख्या के सापेक्ष यह स्थिति इस प्रकार रही -कांग्रेस 16 .61 प्रतिशत, भाजपा 10 .94 प्रतिशत, बसपा 3.59 प्रतिशत,माकपा 3.10 प्रतिशत और भाकपा 0.83 प्रतिशत .
स्पष्ट है कि वतर्मान चुनाव व्यवस्था में आमूल परिवर्तन अब देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए आवश्यक है. ईमानदार और लोकसेवा के प्रति निष्ठावान लोगों को राजनीति में लाना और घोटालेबाजों को बाहर करना अन्ना हजारे के "राइट टू रिजेक्ट -राइट टू रिकाल" से ही संभव लग रहा है."
यहाँ जनकवि देवेन्द्र आर्य की पंक्तियाँ संदर्भित करना चाहूँगा :
"फिर जांचो परखो अपने हथियारों को
फिर से अपना खून-पसीना छानो
वरना क्या होगा तुम जानो.
चुप्पी को हथियार बनाये
ओढ़े धूम-धड़ाका
पारी पारा लुट गए सारे
बाल हुआ न बांका
चूक हुई है हम दोनों से
मानो या न मानो."
No comments:
Post a Comment