Friday, November 29, 2013

खिचड़ी का स्वाद


15 जनवरी 2012 पर 02:02 अपराह्न
इस वर्ष 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जा रही है जबकि पहले यह हमेशा 14 जनवरी को ही मनाई जाती थी .इस विषय पर टी वी और अखबार से ले कर सोशल साइट्स पर भी तमाम चर्चाएँ हो रही हैं .हमारे गोरखपुर में सिद्ध योगी गुरु गोरखनाथ का मंदिर है .मकर संक्रांति के दिन लाखों की संख्या में लोग इस मंदिर में आते हैं और मंदिर के मुख्य गह्वर में चावल ,उरद की दाल ,हल्दी ,नमक ,सिक्के आदि बाबा गोरखनाथ की मूर्ति के सामने भेंट करते हैं .इसे खिचड़ी चढ़ाना भी कहा जाता है.सीमावर्ती देश नेपाल से लेकर उत्तर पश्चिम बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह एक प्रमुख पर्व है .आज के दिन लोग खिचड़ी बनाकर खाते भी हैं .आज की खिचड़ी साधारण नहीं बल्कि विशेष तौर तरीकों से बनती है .सब्जियों का मौसम आ गया है तो आलू प्याज गोभी मटर टमाटर बैंगन सेम गाज़र पत्तागोभी पालक मेथी का साग धनिया सोया अदरक सब कुछ इस खिचड़ी में पड़ता है .ढेर सारी प्याज से देशी घी में छौंक लगा कर और थाली में परसने के बाद ऊपर से कड़कता हुआ ढेर सारा देशी घी डाल कर मूली प्याज चुकंदर टमाटर का मिक्स्ड सलाद , आम या लाल मिर्च का अचार,हरी मिर्च और नींबू के साथ ,तला हुआ पापड सजाव दही जिसमें चीनी नहीं गुड का चूरा पड़ा हो- खिली धूप में परिवार संग खाने का ....चम्मच से नहीं......हाथ से ....उंगलियाँ चाट चाट कर खाने का ....लुत्फ़ शायद आप सारी उम्र नहीं भूल पाएंगे....जैसे कि मैं खुद नहीं भूला हूँ .
माँ और चाची मेरे पुराने घर में आज के दिन सुबह से लकड़ी के चूल्हे पर बड़ा सा हंडा चढ़ा देती थीं ,हम आठ भाई-बहन नहा धो कर खिचड़ी का स्पर्श करके (जिसे खिचड़ी छूना कहते हैं) फटाफट तैयार हो जाते थे . गुड में पगे हुए काले और सफ़ेद तिल ,लईया,चिवडा के सोंधी सोंधी महक वाले लड्डुओं के लिए पहले तो शराफत से ,फिर चोरी और शरारत से और बाद में छीना-झपटी से भी घर में तूफ़ान उठ जाता .बड़े मना करते -ज्यादा मत खा पेट खराब हो जायेगा - मगर भला कौन मानता है.इधर खिचड़ी के हंडे पर कलछुल की चोट बच्चों को अलग पुकार लगाती रहती.
मुझे याद है कि एक बार मेरे चाचा स्वर्गीय श्री ध्यान प्रकाश राय (महात्मा डी पी राय ,भू पू राष्ट्रीय अध्यक्ष,डिप्लोमा इन्जिनिएर्स  फेडेरशन  ) ने -जो मेरे चाचा कम दोस्त अधिक थे -जबतक खिचड़ी तैयार हुई सारे बच्चों की रेल गाड़ी बना कर खुद इंजन बन गए और पूरे अहाते में बाकायदे नारा लगाते रेल गाड़ी दौड़ती रही -"भूख लगी है खिचड़ी दो -बोलो बाबा गोरखनाथ की जय " माँ और चाची हंसती, झुंझलाती परेशान हो गयीं.जब खाने का बुलावा आया तो बजाय अलग अलग थाली या प्लेट के चाचा जी ने एक बड़ी सी परात में भरपूर परसवाया.दही अचार पापड़ सलाद के साथ ढल ढल बहते गरमागरम देशी घी में छाने हुए लाल लाल कुरमुरे प्याज के टुकड़ों से सजी धजी खिचड़ी का   वह  स्वाद ताजिंदगी मैं भुला नहीं सकता .घंटे भर चली रेलगाड़ी की दौड़ से पस्त बच्चों ने जमकर खाया मन भर कर मज़ा लिया .एक साथ सारे भाई बहनों का वह समूह भोज आज भी स्मृतियों के किसी न किसी कोने में ताज़ा है ऐसे जैसे कि अभी कल की ही बात हो .आप भी याद करें तो अवश्य इन पर्वों पर पुरानी स्मृतियाँ अवश्य कहीं न कहीं मन के तार झनझनाती निकल कर आयेंगी .इन्हें संजो कर रक्खें ,इनके अहसास को महसूस करें और संभव हो तो इन्हें बाँटें भी .आप सभी....आपके परिवार को ...खास तौर पर बच्चों को मकर संक्रांति की ढेर सारी शुभकामनाएं.एक गुजारिश है .आज के दिन दान का वास्तविक पुन्य कमाना हो तो किसी गरीब को , ठंढ से ठिठुरते को ,किसी भूखे बच्चे को दान दें .मंदिरों में दान करने वाले तो लाखों हैं ही

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