Friday, November 29, 2013

पूजा

पूजा
23 अक्टूबर 2011 पर 04:33 अपराह्न
सुमन को तीसरी बेटी होने की खबर ने बम की तरह कमरे में धमाका किया था . श्रीमती शर्मा ने खुद फोन रिसीव किया और सुमन की सास की जली कटी सुनते ही उनका माथा घूम गया .धम्म से ज़मीन पर बैठ कर माथा कूटने लगीं,
 "हे भगवान् ,ये मुझे किस पाप की सजा दे रहे हो ? हाय रे मेरी सुमन बिटिया .तेरे तो भाग्य ही फूटे हैं रे ! दो- दो लड़कियां पहले से ही होते हुए फिर तीसरी लड़की पैदा हो गयी ! " पास बैठे शर्मा जी ने लपक कर नहीं उठाया होता तो शायद वे वहीँ ज़मीन पर लेट गयी होतीं .शर्मा जी ने सहारा दे कर उन्हें सोफे पर बिठाया .झुंझलाते हुए बोले ,
"ये क्या बेवकूफी है ? पढ़ी लिखी हो . जानती हो कि लड़का या लड़की होना किसी के बस में नहीं . भगवान् को इसमें क्यों घुसेड़ रही हो ?"
"अरे भगवान् को न कहूं तो किसे कहूं ? सब कुछ तो उन्हीं के हाथ में है . इस बार सुमन को बेटा दे दिया होता तो उनका क्या घट जाता ? जरूर हमारे ही किसी पाप की सजा हमारी बेटी को मिल रही है"
"हुंह -तुम और तुम्हारे भगवान." कहते हुए शर्मा जी ने अख़बार उठा लिया और पन्ने पलटने लगे. इन बातों से बेखबर ,घर की नौकरानी कैलाशी ,कोई गाना गुनगुनाते हुए अपनी ही धुन में आयी और मेज पर पड़े जूठे बर्तन बटोरते हुए बोली ,
" अम्मा जी .कल मैं नहीं आऊँगी."
"क्यों " श्रीमती शर्मा ने त्योरियां चढ़ा कर पूछा.
"कल पूजा चढाने जाना है. "
" कैसी पूजा रे ? कल तो कोई त्यौहार नहीं है ."
"मेरी भैंस गाभिन है न .तरकुलही माई को पूजा चढाने से मन की सारी मुराद पूरी हो जाती है .पहले से इसके दो - दो पंडवा हैं . इस बार मईया के आशीर्वाद से अगर पंडिया हो गयी तो बस मजा ही आ जाये अम्मा जी."श्रीमती शर्मा ने अचकचा कर शर्मा जी को देखा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए अख़बार के पन्ने में मुंह छिपा लिया .

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